गेहूं की वैज्ञानिक खेती से औसत उपज 57.5 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है

परिचय 

गेहूं ( वैज्ञानिक नाम :Triticum aestivum), विश्व की प्रमुख खाद्यान्न फसल है जिसकी खेती विश्व भर में की जाती है विश्व भर मेंभोजन के लिए उगाई जाने वाली अन्य फसलों मे मक्का के बाद गेहूं दूसरी सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल हैधान का स्थान गेहूं के ठीक बाद तीसरे स्थान पर आता है 

भूमि व तैयारी  

 

भूमि  

भूमि दोमट बलुई चिकनी अच्छे जीवांश युक्त अच्छी जलधारण क्षमता वाली जिसका ph  मान 6 से 6.5 के बीच हो अच्छी समझी गई है  

 

भूमि की तैयारी  

पहली जुताई मिटटी पलट हल से और दो तीन जुताई हीरो व टिलर से पाटते (मडा ) की सहायता से समतल करके   खेत को बीज बोन योग्य बना लिया जाता है  

  

बुआई का समय 

अच्छी पैदावार लेने के लिए गेहूं की बिजाई सही समय पर करनी चाहिए 

क्षेत्र 

  

सिंचित 

  

असिंचित 

समय से बिजाई 

 

 

निचले पर्वतीय क्षेत्र 

अक्तूबर के अंतिम सप्ताह - 15 नवम्बर 

  

अक्तूबर के अंतिम सप्ताह15 नवम्बर 

मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्र 

यथोपरि - 

  

यथोपरि - 

  

ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र 

  

अक्तूबर से 15 अक्तूबर 

अक्तूबर से 15 अक्तूबर 

पछेती बिजाई 

 

 

निचले पर्वतीय क्षेत्र 

दिसम्बर के अन्त तक 

  

वर्षा पर निर्धारित परंतु दिसंबर के अंत तक 

मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्र 

यथोपरि- 

यथोपरि - 

ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र 

15 अक्तूबर तक 

15 अक्तूबर तक 

  

यदि देरी से बिजाई की जाये तो उत्पादन में कमी आ जाती है 

 

 

उन्नत किस्में 

गेहूँ की किस्म एचडी 3226 को सिंचितसमय पर बोई गई शर्तों के तहत उत्तर पश्चिमी मैदान क्षेत्र में पंजाबहरियाणादिल्लीराजस्थान (कोटा और उदयपुर संभाग को छोड़कर), पश्चिमी उत्तर प्रदेश (झांसी डिवीजन को छोड़कर), जम्मू और कश्मीर का जम्मू और कठुआ जिलाऊना जिलाहिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड का पनोटा घाटी (तराई क्षेत्रमें वाणिज्यिक खेती के लिए जारी किया गया है 


   

रोग प्रतिरोध 

  • पीलेभूरे और काले जंग के लिए अत्यधिक प्रतिरोधी 

  • कर्नाल बंटपाउडर की तरह फफूंदीश्‍लथ कंड और पद गलन रोग के लिए अत्यधिक प्रतिरोधी 

उपज 

एचडी 3226 की औसत उपज 57.5 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है जबकि आनुवंशिक उपज क्षमता 79.60 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है 

 

 

 

  

 

 

बीज दर  

बीज दर (किलो/हेक्टेयर): 100 

 

बीज उपचार 

गेहूं की बिजाई में किसान प्रमाणित बीजों का इस्तेमाल करें। बिजाई से पूर्व किसान 80 ग्राम थिराम नामक दवाई 40 किलोग्राम बीज में अच्छी तरह मिला लें या 40 ग्राम रेक्सिल नामक दवा को एक बैग में अच्छी तरह मिलाकर बीजोपचार करें 

 

बुआई की विधि 

छिटकवा विधि 

देसी हल या कुदाल से 20 सेमीकी दूरी पर 3 से 4 सेमीगहरी नाली बनाते हैं और इसमें 20 सेमीकी दूरी पर एक स्थान पर 2 बीज डालते हैंबुवाई के बाद बीज को हल्की मिट्टी से ढक देते हैं इसके बाद बुवाई के 2-3 दिन में पौधे निकल आते हैं 

 

सिड्रिल से  

गेहूं की बुवाई सीडड्रिल मशीन से करने पर उर्वरक एवं बीज दोनों की बचत की जा सकती है। गेहूं की खेती करने के लिए 6 से 7.5 पीएच मान वाली दोमट व बुलुई दोमट भूमि उपयुक्त होती है। गेहूं की खेती के लिए अनुकूल तापमान बुवाई के समय 20 से 25 डिग्री सेंटीग्रेट तक का तापमान उपयुक्त माना जाता है 

 

खाद उर्वरक 

उर्वरक खुराक (किलो/हेक्टेयर): नाइट्रोजन: 150 (यूरिया @ 255 किलोग्राम/हेक्टेयर); फास्फोरस: 80 (डीएपी @ 175 किलोग्राम/हेक्टेयरपोटाश: 60 (एमओपी @ 100 किलोग्राम/हेक्टेयरउर्वरक अनुप्रयोग का समयबुवाई के समय फास्फोरस और पोटाश की पूरी खुराक के साथ 1/3 नाइट्रोजनशेष नाइट्रोजन पहली और दूसरी सिंचाई के बाद समान रूप से लागू होती है 

 

सिंचाई 

सिंचाईबुवाई के 21 दिन बाद पहली सिंचाई और बाद में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें 

 

खरपतवार नियंत्रण 

गेहूं बिजाई के तुरंत बाद पेंडीमिथालिन 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल कर छिडक़ाव करने से उगती हुए खरपतवारों का नाश किया जा सकता है। पेंडीमिथालिन के प्रयोग से शुरूआती पहले फसल की मंडूसी/गेहंू का मामा एवं बथुआ का नियंत्रण किया जा सकता है 

 

 

 

गेहूं में खरपतवार नाशक दवा कौन सी है? 

इसलिए कृषकगण 2-4 डी सोडियम लवण 80 प्रतिशत डब्ल्यूपी 01 लीटर दवा 500-600 लीटर पानी में मिलाकर पहली सिंचाई के बाद स्प्रे करें। इसी प्रकार जिन किसानों के खेत में संकरी पत्ती वाली खरपतवार दिखाई दे तो मेटसल्फ्यूराॅन मिथाईल 20 प्रतिशत डब्ल्यू.पी 20-30 ग्राम/मिली./हे. 

 

पादप सुरक्षा  

 

रोग व रोग नियंत्रण  

रतुआ 

  

रतुआ फफूदीरोग की तीन भिन्न प्रजातियों की वजह से होता है। भूरा और पीला रतुआ उत्तरी - पश्चिमी भाषा में विशेष महत्व रखते हैं। इन क्षेत्रों में काला रतुआ काफी विलम्ब से दिखाई देता है और सामान्यतः काफी विलंब से बुआई वाले खेतों को छोड़ अधिक क्षति नहीं पहुंचाते। तथापिमध्य और पूर्वी भारत में काला रतुआ भयंकर रूप में प्रकट होता है और काफी अधिक नुकसान पहुंचाता है। रतुओं को नियंत्रित करने हेतु सर्वाधिक प्रभावी विधि रतुआ - प्रतिरोधी किस्में उगाना है। गेहूं की किस्मों के बीच जैव विविधता से भी रतुआ की समस्या को प्रभावी तौर पर नियंत्रित किया जा सकता है। प्रत्येक फार्म पर एक समय में गेहूं की 3-4 किस्मों का प्रयोग करें। विलम्ब से बुआई अथवा देरी से परिपक्व होने वाली किस्मों से बचा जाए। फसल को रतुआ के संक्रमण से बचाने के लिए 200 लीटर पानी के सज्ञथ 5 लीटर खट्टी छाछ का छिड़काव करें। रतुआ के संक्रमण से बचने के लिए (चौलाई अथवा लाल भाजी - एक आम हरी पत्तेदार सब्जीअथवा मैंथा (पुदीनाके पत्तों के चूर्ण को भी महीन छिड़काव (प्रति लीटर पानी 25-30 ग्राम सूखे पत्तों का पाउडरके तौर पर प्रयोग किया जा सकता है। रतुआ संक्रमण रोकने के लिए हिबिस्कस रोसा-चानेन्सीस (चीनी गुलाबके सूखे पत्तों का सार भी पत्तों पर छिड़काव के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है 

खुला काला चुर्णिल रोग 

  

सभी किस्मों में बाहरी लक्षण रोगग्रस्त पौधे की लगभग प्रत्येक बाल में गेहूं के दानों खाद्यान्न के स्थान पर काले चूर्ण का बनना है। जैविक खेती के तहत प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग सर्वश्रेष्ठ विकल्प है। इसके अतिरिक्तचूंकि यह रोग बीजजन्य हैरोगमुक्त बीज के प्रयोग से इसे होने से रोका जा सकता है। शंका की स्थिति मेंबीज को 5 प्रतिशत वर्मीवाश से संसाधिक करें। संक्रमित पौधों को उखाड़ दें और उनके बीजाणुओं के छितरने से पहले उन्हें जला दें। झुलसाने वाली गर्मी वाले क्षेत्रों में बीजों के धूप के ताप में संसाधन से भी इसके रोगवाहक को काफी हद तक समाप्त किया जा सकता है 

  

बंटुआ 

  

उत्तरी भारत में गेहूं की सभी व्यावसायिक किस्मों में करनाल बंटुआ की समस्या आम है। किन्तु यह रोग पारंपरिक किस्मों में काफी दुर्लभ है। इस रोग से गेहूं के गुणवत्ता और परिमाणदोनों में कमी आती है। खाद्यान्न का एक अंशइसकी लीक के साथ-साथ काले चूर्ण सामग्री में परिवर्तित हो जाता हैजिसमें से बदबू आती है। प्रतिरोधी किस्में उगाना विकल्प है। रोगमुक्त बीजों का प्रयोग करें। बीजों को 5 प्रतिशत वर्मीवॉश से पूर्व संसाधित करें। 100 लीटर जल में 1 कि.ग्रासरसों के आटे और 5 लीटर दूध के मिश्रण का पत्तों पर छिड़काव के तौर पर प्रतिशत नमी की संस्तुति की जाती है। प्राकृतिक अथवा यांत्रिक स्रोतों से इसे सूखाया जाता है। 30 से 40 डिग्री से0 तापमान पर 13 प्रतिशत से अधिक नमी होने पर गेहूं में फफूदी लग सकती है जिसके कारण इसमें फफूदीदार दुर्गंधबदरंगपन और निम्न आटा का उत्पादन होता है। गेहूं के लिए संतुलित नमी मात्रा 70 प्रतिशत सापेक्षिक आर्द्रता पर 13.5 प्रतिशत है। अल्पकाल के लिएभण्डारण में 13 से 14 प्रतिशत नमी की मात्रा सह्य है जबकि 5 वर्ष तक की लंबी अवधि तक के लिए यह 11 से 12 प्रतिशत होनी चाहिए। इसे भृग से बचाने के लिए 0.5 प्रतिशत का तेज काली मिर्च पाउडर मिश्रित करें। गाय का गोबर अथवा 2 प्रतिशत नीम पाउडर भंडारित गेहूं को सूंडी और अन्य पीड़कों से बचाते हैं 

 

कीट व कीट नियंत्रण  

दीमक व टीडे मकौड़े 

दीमक फसल की वृद्धि की किसी भी अवस्था में फसल को क्षति पहुंचा सकती है। यह समस्या सिंचित क्षेत्रों की अपेक्षा वर्षापोषित क्षेत्रों में अधिक प्रमुख है। गैर - सिंचित दशाओं में अविघटित कार्बनिक खाद के प्रयोग से भी दीमक के प्रकोप की संभावना बढ़ सकती है। बुआई के समय मृदा में नीम के पत्ते की खाद (5 क्विंटल/है0) अथवा नीम खाद (1 क्विंटल/है0) के प्रयोग से दीमक के आक्रमण से बचा जा सकता है। चूना और गंधक का मिश्रण जमीन में डालने से दीमक के प्रकोप में कमी आती है। लकड़ी की राख को पौधों के तनों के मूल में डालने से भी दीमक के प्रकोप में कमी आती है। पशु - मूत्र को पानी में 1:6 में मिलाकर बार - बार दीमक के घरों में डालने से उनके प्रसार को रोका जा सकता है। वीवेरिया या मेटाराईजियम फफूद का कण अवस्था में (6 ग्राम प्रति वर्ग मीटरप्रयोग करें 

  

आर्मी वॉर्मस 

  

इस कीट की इल्ली पौधे विशेषकर उसके नाजुक अंगों को रात्रि के दौरान खाती है और दिन के समय छिपी रहती है। वे पत्तों और बालियों को भी क्षति पहुंचाती है। नीम के पत्तों के सत्व (उबले हुए पानी में 5 कि.ग्राटुकड़े-टुकड़े नीम के पत्ते और 100 लीटर पानी में विघटितसे इसके आक्रमण को प्रभावी तौर पर कम किया जा सकता है। संडियों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें। एन.पी.वी., वी.टीका प्रयोग करें। या दशपर्णी का 10 प्रतिशत घोल का प्रयोग करें 

बाउन व्हीट इल्लीएफिड्स और जैस्सिड्स 

गेहूं के साथ सरसों और कुसुम (बुआई के समय प्रत्येक 100 कि.ग्रागेहूं के साथ मिश्रित 100 ग्राम बीजका आंतर फसल से भी कुटकी के फैलाव को प्रभावी तौर पर नियंत्रित किया जा सकता है। गंभीर आक्रमण की स्थिति में, 3-5 दिन तक 100 लीटर पानी में 15 लीटर गौमूत्र, 2 कि.ग्रागाय के गोबर और 15 कि.ग्राटुकड़े-टुकड़े किए नीम के पत्तों का प्रयोग करें। खमीर को छानें और एक एकड़ में पत्तों पर छिड़काव के लिए प्रयोग करें। यह पालतू जानवरों के प्राकृतिक शत्रुओं जैसे सुररखी आदि के लिए सुरक्षित है 

 

उत्पादन  

40-50 क्विंटल/है0 के बीच होती हैं 

 
 

 

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