मोठ(Dew Been) की वैज्ञानिक खेती- मोठ की बुवाई कब की जाती है

मोठ(Dew Been) की वैज्ञानिक खेती- मोठ की बुवाई कब की जाती है
मोठ(Dew Been) की वैज्ञानिक खेती


Botanical classification




Botanical name-Vigna aconitifolia


 family-Fabaceae


chromosome number- 2n = 22 या 24


महत्व एवं उपयोग( Importance and Utility)-




दलहनी फसलों में मोठ सबसे अधिक सुखा सहन कर सकती है। मोठ की बुवाई कब की जाती है मोठ खरीप ऋतू की फसल है 15 जुलाई के आस-पास करनी चाहिए यहां सूखाग्रस्त तथा आर्द्र रेगिस्तानी क्षेत्रों की महत्वपूर्ण फसल है। दाल के रूप में मोठ का प्रयोग करते हैं। मोठ की हरी फलियों का प्रयोग कुछ क्षेत्र में सब्जी के रूप में किया जाता है। मोठ भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है।

इसकी जड़ों में पाए जाने वाला राइजोबियम जीवाणु वातावरण के नाइट्रोजन को भूमि में इकट्ठा करती है । इसे हरी खाद के रूप में भी प्रयोग कर सकते हैं।


वितरण एवं क्षेत्रफल(Area and Distribution)-




मोठ की खेती विश्व के बहुत ही कम देशों में की जाती है। मुख्य देश की खेती मध्यप्रदेश , राजस्थान, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र , गुजरात आदि प्रांतों में की जाती है। राजस्थान में समस्त उत्पादन का 75% व भारत के कुल क्षेत्र का 80% क्षेत्र मोठ के अंदर आता है।

मोठ की खेती


जलवायु(Climate)-




मोठ की फसल वर्ष के विभिन्न महीनों में विभिन्न प्रकार की जलवायु में उगाई जाती है । कुछ स्थानों पर मोठ की फसल 2000 मीटर की ऊंचाई तक उगाई जाती है। 100 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले स्थान पर मोठ की फसल सफलतापूर्वक उगाई जाती है। पौधे पर फलिया आते समय और फलियों के वक्त समय शुष्क मौसम एवं उचित तापक्रम लाभदायक होता है।


भूमि(Land)-




मोठ की फसल काली मिट्टी, दोमट, मटियार तथा एल्यूवियल आदि सभी प्रकार की मृदा में सफलतापूर्वक उगाई जाती है। भारी भूमियों की अपेक्षा हल्की मृदा अधिक उत्तम होती है।


भूमि की तैयारी(Field Preparation)-




मोठ की फसल के लिए पहले जुताई मिट्टी पलट हल से करने के उपरांत हैरों से करने के उपरांत ,उसके बाद दो से तीन जुताई कल्टीवेटर या रूटर की सहायता से करने पर खेतो में पटा चला कर समतल कर दिया लिया जाता है।

मोठ(Dew Been) की वैज्ञानिक खेती


मोठ की उन्नतशील जातियां(Dew Bean Improved varieties)-




मोठ की क्षेत्रीय किस्म जड़िया, राजस्थान के अधिकार क्षेत्र में उगाते हैं। अभी तक मोड की उन्नत किस्म का विकास नहीं हो पाया है । उत्तर प्रदेश में टाइप -1 गुजरात से बालेश्वर -12 व मेवी तथा राजस्थान में बीकानेर की लोकल मोठ से चयन द्वारा एक उन्नत किस्म निकाली गई है । मोठ की उन्नत किस्म RMO- 40 मोठ उगाने वाले अधिकार क्षेत्र में के उपयुक्त है।

प्रभा, मरू वरदान, CAZRI-मोठ-1,FMM- 96 मोठ की उन्नत जातियां है।


बीज उपचार (Seed Treatment)-




बीज सादा प्रमाणित व फफूंदी नाशक दवाइयों जैसे एग्रोसन जी० एन० या कैप्टन या जीराम या थीराम से उपचारित करके बोना चाहिए इन रसायनों की 200 से 250 ग्राम मात्रा एक कुंटल बीज को उपचारित करने के काम आती है।


बीज को बोने से पूर्व राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए।


बीज दर(Seed Rate)-




अकेली फसल - 12 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

मिश्रित फसल - 4 से 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

चारे के लिए - 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर


मोठ की बुवाई कब की जाती है - (बोने का समय व विधि)-




राजस्थान में बुवाई वर्षा प्रारंभ होने पर जुलाई में की जाती है। देर में वर्षा होने पर बुवाई 15 अगस्त तक भी की जा सकती है।


अंतरण (Spacing)- 


पंक्ति से पंक्ति की दूरी 40 से 50 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।


बुवाई की विधि(Method of sowing)-


अच्छे दूरी पर हल के पीछे कुंड में बुवाई करते हैं। बीज सदैव 4 से 5 सेंटीमीटर के गहराई पर नमी के संपर्क में होना चाहिए।

बीजो की बुवाई आजकल सीडड्रिल या छिटकवां  विधि से भी करते हैं।

मोठ(Dew Been) की वैज्ञानिक खेती


खाद एवं उर्वरक(Manure and Fertilizer)-




मोठ की फसल के लिए 200 से 300 कुंटल गोबर की खाद खेत की जूताई के समय अच्छी प्रकार से मिला देनी चाहिए यहां के लिए 15 दिन पहले करनी चाहिए।

मोठ की फसल से अच्छी उपज लेने के लिए 20 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 से 60 किलोग्राम फास्फोरस व पोटाश 30 से 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।

सिंचाई एवं जल निकास(Irrigation and Water Management)-

ग्रीष्मकालीन फसल को 4 से 6  सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।

ग्रीष्मकालीन फसल में सिंचाई का बहुत अधिक महत्व होता है। वर्षाकालीन फसल में अगर सूखा पड़ जाए तो आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए।

मोठ(Dew Been) की वैज्ञानिक खेती


निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण(Weed Control)-




दाने वाली फसल की निराई गुड़ाई बुवाई के 25 से 30 दिन बाद करनी चाहिए दूसरे निराई बुवाई के 45 दिन बाद आवश्यकतानुसार करनी चाहिए।

रासायनिक विधि द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए फ्लूक्लोरेलिन (बेसालिन) 1 किलोग्राम 1000 लीटर पानी में घोलकर बुवाई पूर्व खेत में छिड़ककर भूमि में 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर अच्छी प्रकार से मिला देना चाहिए।


मिश्रित खेती(Mix Crooping)-




मोठ की मिश्रित खेती के लिए मक्का, ज्वार, कपास व गन्ना आदि फसलों के साथ की जाती है।


पादप सुरक्षा-




रोग एवं रोग नियंत्रण(Disease and Disease Control)-


पीला मोजेक-


इस रोग के कारण नई पत्तियां पीली हो जाती है । पत्तियों की शिराओ का किनारा पीला पड़ जाता है। और तत्पश्चात पूरी पति ही पीली पड़ जाती है। यहां रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है।

सफेद मक्खी का नियंत्रण 0.1% थायोडान और 0.1% मेटासिस्टॉक्स के छिड़काव द्वारा नियंत्रण करते हैं। छिड़काव फसल बोने के 20 से 25 दिन बाद तीन चार बार छिड़काव करते हैं।


पर्ण चित्ती-


पत्तियों पर वृत्ताकार व्यास के धब्बे से प्रकट होते हैं‌। कभी-कभी रोग ग्रस्त भागों के साथ मिलने से बड़ा अनियमित आकार का धब्बा बन जाता है । धब्बों का रंग बैगनी, लाल तथा भुरा होता है। इस के प्रकोप से फलियों का रंग काला पड़ जाता है।

इसकी रोकथाम के लिए 0.2% जिनेब का घोल 7 से 10 दिन के अंतर पर छिड़काव करना चाहिए।


चारकोल विगलन-


यहां रोग मुख्य रूप से पौधे की जड़ों तथा तनो का विगलन है ।

इसके रोकथाम के लिए बोने से पूर्व बीज को क्वीण्टोजीन  उपचारित कर लेना चाहिए। इसके अलावा मोजेक वह रस्ट रोग भी मोठ की फसल में लगते हैं गेरुई के लिए 0. 2 प्रतिशत जीनेब का घोल का छिड़काव करें।


कीट एवं कीट नियंत्रण(Insect and Insect Control)-


मोठ की फसल में कीटों का प्रकोप अधिक होता है। मूंग की फसल में बिहार हेयरी कैटरपिलर, सेमिलूपर तंबाकू का कैटरपिलर, और एफीड आदि इन सभी किट पतंग का प्रकोप होता है, जो मौठ की फसल में अधिक नुकसान पहुंचाता है।

इसकी रोकथाम के लिए 0. 15% थायोडीन का छिड़काव करना लाभप्रद है। बी एस सी डस्ट 10% के 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकरने पर भी यहां कीट पतंगे का प्रकोप फसलों पर नहीं होता है।


कटाई एवं मंड़ाई (Harvesting and Threshing)-




बुवाई 115 से 120 दिन बाद अक्टूबर-नवंबर में मौठ के फलिया पकने लगती है। पकने पर फलियों का रंग पीला काला पड़ना प्रारंभ हो जाता है। इस अवस्था पर मोठ की फसल की कटाई कर लेते हैं। फसल को 8 से 10 दिन सुखाकर, दाने बैल चलाकर या डंडे के सहारे अलग कर लेते हैं।




उपज(Yield)-




दाने की औसत उपज 6 से 8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाती है तथा 8 से 10 कुंटल भुसा प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाता है।

 


मोठ की बुवाई कब की जाती है




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