
वानस्पतिक नाम (Botanical name)-Nicotiana sps.
कुल(Family)-Solanaceae
परिचय( Introduction)-
मनुष्य तंबाकू का प्रयोग मुख्य रूप से सिगरेट , बीड़ी, सिगार ,खाने ,नसवार या सुंघना ,हुक्का और चिलम के रूप में पीने के लिए करता है तंबाकू का प्रयोग करने के बाद मनुष्य ताजगी महसूस करता है ।तंबाकू tobacco farming के निर्देश में 250 करोड़ विदेशी मुद्रा अर्जित होती है ।भारत में निर्यात की जाने वाली फसलों में तंबाकू का दसवां स्थान है। तंबाकू की फसल से उत्पादन कर के रूप में लगभग 750 करोड रुपए प्राप्त होता है। तंबाकू के कुल उपज का 25% भाग निर्यात किया जाता है। देश में 18 बड़े सिगरेट कारखाने हैं जिसमें 90000 व्यक्ति कार्य करते हैं तथा तंबाकू आश्रित उद्योग लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं।
तंबाकू का जन्मस्थान दक्षिणी अमेरिका माना जाता है। हमारे देश में इसका प्रचार 17 वी सदी के प्रारंभ में पुर्तगाली यात्री द्वारा हुआ।
क्षेत्रफल एवं वितरण-
संसार में तंबाकू की खेती लगभग 40. 63 लाख हेक्टेयर भूमि में की जाती है। तंबाकू पैदा करने वाले मुख्य देश संयुक्त राज्य अमेरिका ,चीन ,भारत, रूस, ब्राजील और टर्की है।
भारत में तंबाकू उत्पादन करने वाले राज्य आंध्र प्रदेश, गुजरात ,कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि है। टेबल कम जाति के अंदर कुल तंबाकू का 89% क्षेत्रफल आता है जबकि रस्टीका के अंदर 11% क्षेत्रफल आता है।
उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में तंबाकू की खेती सर्वाधिक क्षेत्रफल में होती है । उत्तर प्रदेश के कुल उत्पादन का 36% तंबाकू इस जिले में उगाया जाता है। अधिक क्षेत्रफल में तंबाकू उगाने वाले अन्य जिले जैसे एटा, मुरादाबाद, बदायूं ,सीतापुर ,मेरठ, सहारनपुर, बाराबंकी और अलीगढ़ है।
Tobacco Farming- के लिए जलवायु (Climate)-
तंबाकू उष्णकटिबंधीय पौधा है इसकी खेती उपोष्ण जलवायु में भी की जाती है 50 से 100 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र में इसकी खेती की जाती है अधिक वर्षा तंबाकू के लिए हानिकारक होती है। तंबाकू की सफल खेती के लिए 21°C - 34°C तापमान इस फसल के लिए अच्छा माना जाता है।
तंबाकू के अंकुरण के लिए 24 डिग्री से 26 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है।
भूमि व की तैयारी-
तंबाकू की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में की जाती है। खुली हुई अच्छे जल निकास वाली तथा समुचित बायो संचार योग्य भूमि की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। हल्की दोमट भूमि जिसमें जीवांश की मात्रा कम हो तंबाकू के लिए उपयुक्त होती है । जिसका पीएच मान 5 -6 के बीच होनी चाहिए उपयुक्त मानी जाती है।
तंबाकू अनेक भूमियों में लोग बड़े पैमाने पर उगाते हैं। चिकनी काली मिट्टी, लाल दोमट या जालौर भूमियों में इसकी खेती की जाती है।
भूमि की तैयारी के लिए सर्वप्रथम 3-4 जुताई हैरो से करते हैं। उसके बाद कल्टीवेटर से दो से तीन जुताई तथा रूटर की एक जुताई और अंत में पाटा चलाकर खेत को समतल कर लिया जाता है।
तंबाकू का वर्गीकरण -
1)वनस्पतिक वर्गीकरण-
क)निकोटियाना टेबेकम (देसी)
ख)निकोटियाना रेस्टीका(विलायती)
2) प्रयोग के आधार पर वर्गीकरण-
हुक्का तंबाकू(Hooka Tobacco)
बीड़ी तंबाकू(Bidi Tobacco )
सिगरेट तंबाकू(Cigarette Tobacco )
सिगार तंबाकू(Cigar Tobacco )
चुरुट तंबाकू(Cheroot Tobacco )
खाने का तंबाकू(Chrwing Tobacco )
सूंघनी तंबाकू(Snuff Tobacco )
लपेटने वाली तंबाकू(Wrapper Tobacco)
उन्नत जातियां-
तम्बाकू के प्रकार
उन्नत जातियाँ
क्षेत्र जो खेती के लिये उपयुक्त है
हुक्का तम्बाकू
सरायमीरान तम्बाकू-1 एन० पी० एस० उत्तर 2116, एन० पी० एस० 219, सी० 302, एन० पी० 18, कलकतिया, बौनिया, गोभी, आर०- 12, डी०डी० 413, 415, 417, मोतीहारी, डी० पी० 401, हकरा
उतर प्रदेश,बिहार, पश्चिमी बंगाल
सिगरेट
हैरिसन स्पैशल (Harrison special), आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक नाटू, वरजीनिया गोल्ड, कनक प्रभा, धनाड्यी, हैरिसन स्पैशल - 9, सी० सी० आर० आई० स्पैशल, व्हाइट गोल्ड, | डैलक्रेस्ट, चैथम, एमोरेलो- 5, गोथामी
आंध्रा प्रदेश, कर्नाटक
बीड़ी तम्बाकू
केo 20, केo 49, आनन्द-2, आनन्द-3, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र एस०-20, कलकत्ती, जी० -6, भोजगुण्ड
गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट
खाने वाली तम्बाकू (Chewing)
भाग्य लक्ष्मी, सोना, गंडक बहार, एन० पी० तमिलनाडू उ० प्र०, बिहार 35, एन० पी० 70, आई० 54, 115, के०-1, वी० डी०- 1, एस०- 1, पी० बी० 7, बोरी भराओ - 10, 34, मीनाक्षी
तमिलनाडु, उतर प्रदेश, बिहार
चुरुट
भवानी स्पैशल, ओ० के० -1, आई० 737, उसीकप्पल, लंका- 27, डी० आर० -1
आन्ध्र प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु
सिगार रैपर
सोनाकप्पल, कुर्चा, बारू, यरुमाई कप्पल, डिक्सी शेड, रंगपुर सुमात्रा
बंगाल तथा तमिलनाडु

बीज की मात्रा-
एक हेक्टेयर पौध प्राप्त करने के लिए 100 से 120 ग्राम बीज प्राप्त होती है ।बीज को 2. 5% पर फॉर्मेलीन घोल में उपचारित कर क्यारी में 1 से 1. 5 सेंटीमीटर गहरा 5 सेंटीमीटर की दूरी पर बनाई गई पंक्ति में बो दिया जाता है।
पौध क्यारियों का निर्माण-
तंबाकू की 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल में रुपए के लिए 10 × 1 मीटर आकार की 12 क्यारियां तैयार करनी चाहिए। क्यारियां मृदा की सतह से 10- 12 सेंटीमीटर ऊंची उठी हुई तैयार करते हैं। 2 क्यारियां के बीच में 45 से 50 सेंटीमीटर चौड़ी नाली बनाई जाती है। यहां नाली पानी की निकासी के लिए प्रयोग में लाई जाती है। 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल से 90 से 100 हेक्टेयर क्षेत्र के रोपाई की जा सकती है।
बीज जमाव के बाद नर्सरी के 3 से 4 दिन के अंतर से सिंचाई की जाती है। साथ ही साथ 7 से 8 दिन के अंतर पर 5 बार 50 ग्राम यूरिया प्रति क्यारी में डालते रहना चाहिए।
बुवाई का समय-
सितंबर -अक्टूबर सभी प्रकार कि तंबाकू वही जा सकती है।
दिसम्बर हुक्का तंबाकू ,फरवरी-मार्च हुक्का तंबाकू
सिगरेट तंबाकू उत्पन्न करने वाले क्षेत्र में 20 अगस्त अथवा सितंबर में बोया जाता है । बीड़ी तंबाकू उत्पन्न करने वाले क्षेत्र में 20 जुलाई के प्रथम सप्ताह में बो दया जाता है। हुक्का तंबाकू का बीज देसी या विलायती दोनों ही मध्य नवंबर से मध्य दिसंबर तक बोया जाता है। सिगार तथा खाने वाले तंबाकू के बीज अक्टूबर में होते हैं।
खेत में पौधे की रोपाई-
जब पौधों की आयु 40 से 50 दिन की हो तो उन्हें उखाड़ कर तैयार खेत में लगाया जाता है। रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई कर देना चाहिए।
पौधों की दूरी-
तम्बाकू की किस्म
पंक्ति से पंक्ति की दूरी (सेमी०)
पौधे से पौधे की दूरी (सेमी०)
(1) सिगरेट तम्बाकू
90
75
(2) बीड़ी तम्बाकू
90
90
(3) हुक्का तम्बाक
(अ) देशी
45
22
(ब) विलायती
30
15
(स) सरायमीरान तम्बाकू
45
45
(4) खाने वाली तम्बाकू
(अ) देशी
90
90
(ब) विलायती
45
45
(5) चुरुट तम्बाकू
90
75
(6) सूँघने वाला तम्बाकू
75
60
(7) सिगार तम्बाकू
50
30
खाद तथा उर्वरक-
तंबाकू की फसल के लिए 200 से 300 क्विटल गोबर की खाद खेतों में तंबाकू लगाने के 1 महीने पहले अच्छी प्रकार से मिला देनी चाहिए।
तम्बाकू किस्म
पोषक तत्व किग्रा० / है०
नाइट्रोजन
फॉस्फोरस
पोटाश
सिगरेट
20-25
50
50
हुक्का
150
20
30
बीड़ी व अन्य किस्मों के लिये
100-150
30
3
सिगरेट तंबाकू में नाइट्रोजन की मात्रा बहुत कम दी जाती है क्योंकि नाइट्रोजन के अधिक मात्रा देने से तंबाकू में निकोटिन की मात्रा बढ़ जाती है।
उर्वरक की मात्रा डीएपी और पोटाश की पूर्ण पूर्ण मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधा भाग आखरी जूताई के समय खेतों में मिला देनी चाहिए। बची नाइट्रोजन की मात्रा एक से दो बार खेतों में पहले- दूसरे पानी में छिड़काव कर देनी चाहिए।
सिंचाई एवं जल निकास-
तंबाकू की फसल पर खारे पानी का अच्छा प्रभाव पड़ता है, जिससे पैदावार में बढ़ोतरी हो जाती है।
रुपए के तुरंत बाद पहले सिंचाई करनी चाहिए तथा आवश्यकतानुसार 7 से 8 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए। फसल के परिपक्व होने तक 8 से 10 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।
खरपतवार नियंत्रण व निराई- गुड़ाई-
खेत को खरपतवार रहित करने के लिए तीन से चार बार खुरपी से निराई गुड़ाई करना आवश्यक होता है। पहले निराई गुड़ाई रोपाई के 20 से 25 दिन बाद की जाती है। निराई गुड़ाई करने से मृदा नमी का संरक्षण व बायो संचार बढ़ता है।
शीर्षकर्तन या चोटी कलम करना (Topping)-
तंबाकू के पौधे की सबसे ऊपर वाले कालिकाओ अथवा केवल पुष्पक्रम को तोड़ना शीर्षकर्तन कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है-
1) चोटी पर शीर्षकर्तन- इसमें केवल पुष्पक्रम को ही तोड़ा जाता है। सिगरेट तंबाकू मे यहां क्रिया की जाती है।
2) निचला शीर्षकर्तन- इसमें पुष्पक्रम के साथ-साथ 2 से 3 छोटी-छोटी ऊपरी पत्तियों को भी तोड़ दी जाती है।
शीर्षकर्तन का उद्देश्य यह है कि फूलों को मिलने वाला आहार व शक्ति पत्तियों को मिलने लगे जिससे पत्तियां बड़ी मोटी एवं धारीदार तथा उत्तम गुण वाली हो जाती है।
सिगरेट तंबाकू में 8 पत्ती , बीड़ी तंबाकू में 10 से 12, चुरूट और खाने वाले तंबाकू में 12-14 ,तथा हुक्का तंबाकू में 12-16 पत्तिया प्रति पौधा छोड़कर शीर्षकर्तन करते हैं।
छोटी-छोटी शाखाएं तोड़ना (Desuckering)-
शिक्षक रतन के 1 सप्ताह पश्चात पत्तियों के अक्ष में उपस्थित कालिका और से छोटी-छोटी शाखाएं निकलना प्रारम्भ होती है। इसको भूस्तरी कहते हैं इनके तोड़ने की प्रक्रिया को ही Desuckering कहा जाता है।
एक बार Desuckering की क्रिया करने के पश्चात यदि पत्तियों के अक्ष में मौलिक हाइड्रोजन या नारियल का तेल लगा दिया जाए तो शाखाये निकलना बंद हो जाता है। यहां किराया बार-बार दोहराने नहीं पड़ती है।
छेदना(Piercing)-
शीशे कर्तन के तुरंत बाद 20 से 25 सेंटीमीटर लंबी सुई से तने को छेड़ने पर रचाई गई पत्तियों की उपज में वृद्धि होती है।
फसल सुरक्षा-
रोग नियंत्रण(Disease Control)-
तंबाकू पर निम्न बीमारियों का प्रकोप होता है-
1) आर्द्र गलन रोग या पौधे सड़ना(Damping off)-
यह रोंग अधिक नमी के कारण फफूंदी द्वारा फैलता है पौधे की जड़े सड़ने से मुरझा कर सूख जाते हैं।
इसके नियंत्रण के लिए कम से कम 2 वर्ष तक फसल चक्र अपनाना चाहिए। रोगी पौधे को उखाड़ देना चाहिए। बीज को 0.2% ब्लाइटाक्स -50 के घोल से उपचार करके बोना चाहिए। बोर्डो मिश्रण 2 : 2 : 50 का दो से तीन बार 1 सप्ताह के अंदर से छिड़काव करना चाहिए।

2)मोजेक रोग (Mosaic)-
इस रोक से पत्तियां चितकबरी हो जाती है। हल्के हरे या पीले धब्बे पत्तियों पर फैले होते हैं। पत्तियां खुरदरी एवं किनारे नीचे मुड़े हुए होते हैं।
रोगी को पौधे को खेत से बाहर उखाड़ कर फेंक देना चाहिए । 2 से 3 वर्ष तक फसल चक्र अपनाना चाहिएं।
पर्णकुन्चन रोग(Leaf Curl)-
इस रोग से ग्रसित पौधे बोने रह जाते हैं। ग्रसित पौधे की पत्तियां सिकुड़ी हुई झाड़ीनुमा दिखाई देती है। विषाणु का प्रसार सफेद मक्खी द्वारा होता है।
इसकी रोकथाम के लिए साइपरमैथरीन 4% क्लोरोपायरीफास 40 % तथा मिथाइल ऑडिमेटान 1.0 लीटर प्रति हेक्टेयर सफेद मक्खी की रोकथाम हेतु प्रयोग करना चाहिए।
4) चूर्णी फफूंद (Powdery mildew)-
यहां फफूंद से लगने वाला रोग है । तंबाकू के पत्ते पर धब्बे के रूप में सफेद चूर्ण दिखाई देता है। पहले यहां धब्बे निचले पत्तियों पर दिखाई देते हैं। बाद में ऊपरी पत्ते पर दिखाई देते हैं।
इस रोग के नियंत्रण हेतु बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए या रिडोमिल का छिड़काव अधिक लाभदायक रहता है।
कीट नियंत्रण(Insect Control)-
1) तंबाकू की गिडार(Tobacco caterpillar)-
यहां गिडार हल्के भूरे रंग का कीट होता है । जो अंधेरे में पत्तियों को काटता है। पौधे पीले पड़ जाता है और फसल काफी कमजोर हो जाती है।
इसके नियंत्रण के लिए बी०एच०सी० 10% 30 किलोग्राम या ऑल्डिन 5% 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकरना चाहिए या एंडोसल्फान 35 ई०सी० का 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

2)कठुआ कीट(Cut worm)-
इसके सूंडी पौधों को जमीन की सतह से काटकर हानि पहुंचाती है।
इसके रोकथाम के लिए पौधे की रोपाई के पूर्व खेत में अल्ट्रीन या हेप्टएक्लोर 5% धूल की 25 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर इधर से प्रयोग करें।
3) माहू कीट(Aphids)-
गहरे रंग के छोटे-छोटे कीड़े होते हैं। जो पत्तियों और तने के रस को चूसते हैं जिससे पौधे पीले पड़ जाते हैं। और फसल काफी कमजोर हो जाती है।
इसके रोकथाम के लिए मेलाथियान 5% 30 किलोग्राम या मिथाइल ऑडिमेटान 25 ई०सी० 1 लीटर प्रति हेक्टेयर अथवा फास्फेमिडान 250ml प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अंदर पर दो से तीन छिड़काव करना चाहिए।
तंबाकू की कटाई-
1)प्राईमिंग विधि (Priming mathod)-
तंबाकू निचले पत्ते सबसे पहले पक कर तैयार हो जाती है। इसके पश्चात ऊपरी पत्तियां धीरे-धीरे पकती जाती है। इस तरह से पत्ते पकने पर हमे उन पत्तो पहले तुड़ाई कर लेते हैं। तथा आवश्यकतानुसार पड़ने पर जिस तरह से फसल की पत्ती तैयार होती है ।उसी आवश्यकता से हम पत्तियों की तोढ़ाई कर लेते हैं।
2)पौधे को जड़ से काट कर(Stalk cut method)-
सिंगार ,चूरूट, बीड़ी ,हुक्का और खाने वाले तंबाकू की कटाई इस विधि से की जाती है। कटाई उस समय की जाती है ।जब पत्तियां अधिक पक गई हो इस विधि में पौधे को जड़ से काट कर रात भर खेतों में पड़ा रहने दिया जाता है। सुबह खेत से उठा लेते हैं।
पत्तियों की रचाई सा सिंझाई या संसाधन(Curing of Tobacco Leaves)-
तंबाकू की कटाई के पश्चात इसके पौधे इसी अवस्था में प्रयोग करने योग्य नहीं होते है, क्योंकि कटाई के पश्चात पत्तियों में नमी अधिक रहती है । साथ ही पत्तियों में उचित मात्रा में रंग, स्वाद, गठन और लचक नहीं होती है।
सुखाई के विभिन्न क्रियाये, जिनके द्वारा तंबाकू में वांछित, रंग, गन्ध, नमी व गठन (लचक )उत्पन्न की जाती है। तंबाकू की रचाई कहलाती है। रचाई के कारण पत्तियों में नमी कम हो जाती है ( 10 से 20% तक) तथा कार्बोहाइड्रेट्स व नाइट्रोजन पदार्थों में परिवर्तिन हो जाता है।
रचाई की विभिन्न विधियां (Different Mathod of Curing)-
तंबाकू के रचाई के समय तंबाकू के गुणों पर आधारित एवं तापमान पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है । रचाई की विभिन्न विधियां निम्नलिखित है-
A) वायु संसाधन (Air Curing)-
1) भूमि संसाधन- इस विधि से पूर्ण पौधे तथा प्राइमिंग द्वारा कटाई की गई पत्तियों दोनों की रचाई की जाती है। पूरे पौधे को फर्श पर सुखाने की विधि उत्तर प्रदेश , बिहार, पश्चिम बंगाल व पंजाब में प्रचलित है । उत्तर प्रदेश में हुक्का व खाने की तंबाकू, लपेटने वाली व हुक्का तंबाकू पश्चिम बंगाल में फर्श पर ही सुखाई जाती है।
2) पिट या गड्ढे का संसाधन- यहां विधि पंजाब ,बिहार तथा महाराष्ट्र में प्रयोग की जाती है इसमें आवश्यकतानुसार लंबाई व चौड़ाई वाला गड्ढे 1 मीटर गहरे बनाए जाते हैं। रचाई तंबाकू को गड्ढों में भरकर की जाती है। गड्ढे में भरने से पहले पौधों को 3 से 4 दिन तक सूखने के लिए खेत में ही पड़ा रहने देते हैं। इसके बाद गड्ढे में सबसे नीचे 20 सेंटीमीटर मोटाई में धान के पुआल अथवा मदार की पत्तियां बिछाई जाती है। इस पर्त के ऊपर तंबाकू की 50 सेंटीमीटर मोटी परत लगाकर और अंतिम 20 सेंटीमीटर मोटी फिर पुआल मदार की पत्तियों की लगाते हैं। पत्तियों को 2 से 3 दिन के अंतर पर उलटफेर करते रहना चाहिए। इस प्रकार 4 से 8 सप्ताह में पत्ते का पूर्ण संसाधन हो जाता है।
B) अग्नि संसाधन (Fire Curing)-
इस विधि के द्वारा जाफना तंबाकू का संशोधन किया जाता है। यहां दक्षिण भारत में प्रचलित विधि है । इस विधि में एक धूम्र झोपड़ी में पत्तियों को गुस्से में बांधकर इराक में लटका दिया जाता है । रात्रि में एक झोपड़ी में घास -फुंस या बुरादा नारियल का छिलका आदि को जलाकर धुआ किया जाता है। 12 घंटे बाद पत्तियों को निकाल कर 3 दिन तक ढेरी में रखते हैं। इस क्रिया को बार-बार तब तक दोहराया जाता है जब तक पत्ते में वंचित रंग ना आ जाए। धुंए के प्रभाव से पत्तियां कुछ क्रियोजोटिक पदार्थ ग्रहण कर लेती है और उनमें विशेष स्वाद उत्पन्न हो जाता है।
C) सूर्य संसाधन (Sun Curing)-
इस विधि में पूरे पौधों को 15 से 20 दिन तक रैक पर रखकर धूप में सुख जाता है।
उत्तर प्रदेश में हुक्का तंबाकू के पूरे पौधे को जमीन पर रखकर सुखाते हैं। इस प्रकार सूर्य संसाधन खाने वाले, हुक्का या बीड़ी तंबाकू की रचाई के लिए प्रयुक्त होता है।
उपज(Yield)-
तंबाकू के विभिन्न किस्मों से सूखे पत्ते की प्रति हेक्टेयर उपज निम्न प्रकार है-
सिगरेट तंबाकू- 7.5 -9.5 कु०
खाने वाली व बीड़ी तंबाकू- 10-12 कु०
हुक्का तंबाकु- 12-16 कु०
चुरुट तम्बाकु- 10-12 कु०
हुक्का तंबाकू की एन०पी०एस० 219 वह लकड़ा किसमें की उपज- 20-25 कु० उपज प्राप्त हो जाती है।
तंबाकू की पत्तियों में निकोटिन की मात्रा-
सिगरेट तंबाकू- 1-2% निकोटीन
खाने वाली व बीड़ी तंबाकू- 2.5-5.5%
हुक्का तम्बाकु- 3-7%
सिंगार तंबाकू- 2-3%
चुरुट तंबाकू- 3-4%
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