
चवला की खेती या लोबिया
वानस्पतिक वर्गीकरण (Botanical Classification)
वानस्पतिक नाम वगना अनज्यूकुलाता (Vigna unguiculata L. Walp)
कुल (Family) — फेबेएसी (Fabaceae)
गुणसूत्र संख्या-2n = 22 या 24
महत्त्व एवं उपयोग चवला की खेती करने का सही तरीका जानलो, चवला की खेती छोटे किसानों के लिए फायदेमंद है चवला की खेती 5 किस्में 45 से 50 दिन में पककर होंगी तैयार, लोभिया की खेती भारत में दाने, हरी सब्जी, हरे चारे और हरी खाद के लिए की जाती है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में लोबिया के दानों (साबुत) को दाल व पूरी; फलियों को सब्जी बनाने के काम में लाते हैं। लोबिया को ज्वार, बाजरा या मक्का के साथ मिलाकर करे के लिए भी बोते हैं जिससे यह पौष्टिक हो जाता है। इसको सूखा चारा (hay) तथा साइलेज बनाने में भी प्रयोग में लाते हैं। इसके दानों में मिथियोनिन नामक अमीनो अम्ल की मात्रा अन्य दलहनों की अपेक्षा अधिक होती है, जिसके कारण प्रोटीन मान अन्य दलहनों से अधिक होता है। कुल प्रोटीन का 1.9% मिथियोनिन होता है। प्रोटीन दानों में 23.4% कार्बोहाइड्रेट 60-30% व वसा 1-8% होता है। हरी फलियों में प्रोटीन 4.3%, कार्बोहाइड्रेट 80%, वसा 0.2% तथा खनिज 0-9% तक होते हैं।
उत्पत्ति एवं इतिहास -
मध्य अफ्रीका में लोबिया की सभी जातियाँ जंगली रूप में पाई जाती हैं। अतः मध्य अफ्रीका को इसका जन्म स्थान मानते हैं। यहीं से यह विश्व के अन्य क्षेत्रों में फैला है।
वितरण एवं क्षेत्रफल -
आजकल विश्व के अनुकूल जलवायु वाले प्रायः प्रत्येक भाग में इसकी खेती की जाती है। मध्य-पूर्व, मध्य यूरोप, दक्षिणी यूरोप, समस्त अफ्रीका, एशिया तथा ऑस्ट्रेलिया में और उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका में लोबिया की खेती की जाती है। विश्व के लोबिया उगाने वाले लगभग 26 लाख हे० क्षेत्रफल का 25 लाख हे० क्षेत्रफल अकेले अफ्रीका में ही है। विश्व की औसत पैदावार 450 किम प्रति हे० है । भारत में लोबिया के अन्तर्गत आने वाले क्षेत्रफल का अलग से लेखा-जोखा प्राप्त नहीं है। जलवायु लोबिया मीष्म तथा वर्षा ऋतु में उगाई जाने वाली फसल है इसकी जलवायु सम्बन्धी आवश्यकताएँ मक्का तथा ज्वार जैसी हैं। दक्षिणी भारत में इसकी खेती रबी के मौसम में भी की जाती है लोबिया में मक्का की अपेक्षा सूखा तथा गर्मी को सहन करने की शक्ति अधिक होती है।

ग्रीष्मकालीन फसल के लिए सिंचाई आवश्यक होती है। लोबिया के बीज 14°C - 15°C से नीचे तापक्रम हो जाने पर अच्छी प्रकार से अंकुरित नहीं हो पाते हैं। फसल पर 40°C उच्च तापक्रम तक भी कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है पाले व कम तापक्रम का वृद्धि पर कुप्रभाव पड़ता है।
चवला की खेती के लिए भूमि-
लोबिया की खेती भारी भूमियों के मुकाबले हल्की भूमियों पर अधिक सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसकी उचित वृद्धि तथा बढ़वार के लिए दोमट और मटियार दोमट भूमि जिसकी pH 7.5 तक होती है, उपयुक्त होती है।
उपयुक्त जल-निकास वाली भूमियाँ इसके लिए उपयुक्त सिद्ध हुई हैं। जिन भूमियों में जल निकास का प्रबन्ध नहीं है, लोबिया की खेती के लिए हानिकारक सिद्ध हुई है।
भूमि की तैयारी -
मूंग की फसल के लिए पहले जुताई मिट्टी पलट हल से करने के उपरांत हैरों से करने के उपरांत ,उसके बाद दो से तीन जुताई कल्टीवेटर या रूटर की सहायता से करने पर खेतो में पटा चला कर समतल कर दिया लिया जाता है।
बीज उपचार-
बीज सदैव 0-25% धीराम या सेरेसान से उपचारित करके बोना चाहिए। प्रमाणित बीज प्रयोग करना चाहिए।
बुआई का समय, विधि एवं बीज की मात्रा -
खरीफ की फसल को वर्षा शुरू होते ही बो देना चाहिए। इस फसल को कतारों में 30-45 सेमी की दूरी पर बोना चाहिए और पौधे से पौधे की दूरी 8-10 सेमी होनी चाहिए। ग्रीष्मकालीन फसल को 15 फरवरी के बाद में 15 अप्रैल तक बोया जा सकता इस समय कतार से कतार की दूरी 30 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 8-10 सेमी रखनी चाहिए। दाने है।

उन्नतशील जातियाँ-
उत्तर-प्रदेश में दाने तथा हरी सब्जी (फलियों) के लिए उगाई जाने वाली प्रमुख उन्नत किस्मों का विवरण निम्न प्रकार दिया गया है-
1. पूसा दो फसली - यह शीघ्र पकने वाली खरीफ तथा प्रीष्म ऋतु दोनों ऋतुओं में उगाने के लिये उपयुक्त है। यह किस्म 70-80 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसकी फलियों हल्के रंग तथा लम्बी होती है। इसके दाने पूसा फाल्गुनी से कुछ बड़े तथा उन पर धाब्बे होते हैं। और दाने की उपज प्राप्त 12-15 कुo प्राप्त हो जाती है।
2. पूसा ऋतुराज- यह किस्म खरीफ तथा ग्रीष्म ऋतु दोनों मौसम में उगाई जा सकती है। इसकी फलियाँ लगभग 20 सेमी लम्बी तथा पतली होती हैं। इसके पौधों पर फलियाँ बहुत अधिक संख्या में लगती हैं। एक हेक्टेयर से लगभग 80-85 क्विटल हरी फलियां मिल जाती है। दाने की उपज 10-12 कु० प्रति हे० मिल जाती है।
3. पूसा फाल्गुनी - यह लगभग 60-70 दिन में पक जाती है। प्रीष्म (बसन्त) ऋतु में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसके पौधे छोटे तथा झाड़ीनुमा होते हैं। इसके दाने सफेद रंग के छोटे तथा बेलनाकार होते. हैं। इसकी हरी फलियों से सब्जी भी बनाई जाती है। एक हेक्टेयर से 10-12 कु० उपज मिल जाती है।
4. V-240—यह किस्म 1984 में पूसा फाल्गुनी से विकसित की गई है। पश्चिमी उ० प्र० के उपयुक्त है। फसल अवधि 70-75 दिन है। बीज गोल-लाल रंग के होते हैं। औसत उपज 8-10 कु० / हे० है ।
5. एफ० एस० 68— हिसार से विकसित यह किस्म ग्रीष्म ऋतु में उगाने के लिए उपयुक्त है। लगभग 70-75 दिन में पककर तैयार होती है। इसके दाने सफेद तथा आकर्षक होते हैं। इसकी फलियाँ कम लम्बाई की होती हैं। एक हेक्टेयर से 10-12 कु० उपज मिल जाती है।
6. पूसा बरसाती - यह किस्म 110-120 दिन में पकती है। खरीफ के मौसम में ही उगाने के लिए उपयुक्त है। इसकी फलियाँ लम्बी तथा सफेद रंग की होती हैं। इसके दाने का पिछला भाग बड़ा व लाल रंग का होता है। फलियों की सब्जी अच्छी बनती है। एक हेक्टेयर से 12-15 कु० उपज मिल जाती है।
7. सी० 152 - यह किस्म 110 दिन से 115 दिन में पककर तैयार होती है। यह खरीफ में उगाने के लिए उपयुक्त है। फलियाँ लगभग 15 सेमी लम्बी होती हैं। दाने मध्य आकार के भूरे व हल्के रंग के होते हैं एक हेक्टेयर से 12-16 कु० उपज मिल जाती है।
8. टाइप 2 – यह किस्म 110 से 130 दिन में पककर तैयार होती है। इसकी पत्तियाँ लम्बी तथा चिकनी होती हैं। इसके दाने मध्यम आकार के तथा उनके ऊपर भूरे रंग के धब्बे होते हैं। एक हे० से लगभग 12-16 कुo उपज मिल जाती है। यह किस्म वर्षा ऋतु में उगाने के लिए उपयुक्त है।

9. पूसा कोमल- नई विकसित उन्नत किस्म है।
दाने के लिए लोबिया की उन्नत किस्में-
1. अम्बा - खरीफ की फसल के लिए लाल दाने वाली यह किस्म सभी प्रकार की परिस्थितियों के लिए उपयुक्त है। इसमें फफूँद तथा जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न रोग नहीं लगते और विषाणु (वायरस) का प्रभाव भी नगण्य होता है। यह एक मध्य अवधि में पकने वाली किस्म है जो 45 दिन में फूल देने लगती है और 95-100 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उपज 27-28 क्विटल प्रति हेक्टेयर तक आँको गई है ।
2. स्वर्ण (बी-38)- यह किस्म अम्बा से जल्दी पककर तैयार हो जाती है। इसका दाना कुछ छोटा हल्का गोल और दो रंग का होता है। दाने के 'मुँह' पर सुनहरा व पीठ पर रंग लाल होता है। इस किस्म में बीमारियों का प्रकोप नहीं होता है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि फली का डंठल काफी लम्बा होता है और सारी फलियाँ फसल के ऊपर रहती हैं। फसल पकने पर भी फलियों को आसानी से इकट्ठा किया जा सकता है जबकि हरा पौधा खेत में खड़ा रहता है जिससे हरे चारे अथवा खाद के लिए अलग से प्रयोग में लाया जा सकता है। इस किस्म की हरी फली काफी नर्म, रसीली व स्वादिष्ट होती है
खाद व उर्वरक -
लोबिया की फसल के लिए 200 से 300 कुंटल गोबर की खाद खेत की जूताई के समय अच्छी प्रकार से मिला देनी चाहिए यहां के लिए 15 दिन पहले करनी चाहिए।
उर्वरक
N
P
K
उर्वरक की मात्रा /हे
20-30 KG
50-60 KG
30-40 KG
सिंचाई एवं जल निकास -
मृदा में उपलब्ध नमी 50% रहने पर सिंचाई करनी आवश्यक होती है। बसंतकालीन (मीष्मकालीन) फसल में 10-15 दिन के अन्तर पर सिंचाई की जाती है।
वर्षाकालीन फसल में जल निकास का उचित प्रबन्ध होना अत्यन्त आवश्यक है। खेत में पानी का कुछ समय भी रुकना फसल के लिए अत्यन्त हानिकारक है।
निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियन्त्रण-
उर्द व मूँग के समान ही इसमें भी खरपतवार नियन्त्रण कर सकते हैं। विस्तृत वर्णन पिछले अध्यायों में किया गया है।
पादप सुरक्षा-
रोग एवं उनका नियन्त्रण-
(1) शुष्क मूल गलन (Dry root rot) -
यह रोग कवक द्वारा लगता है। इससे जड़ें गलने लगती हैं और पौधे सूख जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोगरोधक किस्में और उचित फसल चक्रों का प्रयोग करना चाहिए। बीमारी से फसल को बचाने के लिए मूँग व उर्द में जो उपाय बताए गए हैं, उनका प्रयोग करना चाहिए।
(2) चूर्णी फफूंदी या चूर्णिल आशिता (Powdery mildew)-
यह रोग भी फफूँदी के कारण लगता है। इसके लक्षण पत्तियों पर दिखाई देते हैं जो सफेद चूर्ण के रूप में होती है। ये फफूँद के माईसीलीयम होते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोधक रसायन के चूर्ण का घोल छिड़कना चाहिए और रोगरोधी किस्म बोनी चाहिए। प्रभावित फसल पर 3 किया सल्फैक्स या इलोसाल को 1000 ली. पानी में घोलकर एक हेक्टेयर में छिड़क दें।
(3) गेरुई (Rust) –
यह रोग फफूँद से लगता है। इसके लक्षण पत्तियों की निचली सतह पर दिखाई देते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोगरोधी किस्में बोनी चाहिए। डाइयेन जेड-78 या डाइथेन एम-45 जैसी फफूँदीनाशक दवाइयों का 0-25% के घोल का छिड़काव करें।
(4) मोजैक (Mosaic)-
यह रोग विषाणु (virus)- द्वारा लगता है और इसके लक्षण पत्तियों पर पीले और हल्के हरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं। यह रोग सभी जातियों में लगता है। पत्तियों में कर्मरण (mottling) हो जाता है। रोगमसित पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। रोग की बढ़वार को रोकने के लिए कुछ कवकनाशक दवाओं का छिड़काव करना भी अच्छा है। इसके अतिरिक्त टेरामाईसीन से रोगप्रसित बीजों को उपचारित करने से रोग का निदान होता है।
(5) वृण रोग या एन्टैक्नोज-
इस रोग में पौधे के रोगमसित भाग पर गहरे भूरे चिपके दाग (spot) जिनके बाहर लाल या पीली रेखाएँ उभरी रहती हैं, दिखाई पड़ते हैं। पत्ती दाग वाले स्थान से कागज की तरह पतली हो जाती है तने फटकर गल जाते हैं। जड़ का रंग भी बदल जाता है। इसकी रोकथाम के लिए स्वस्थ बीजों का प्रयोगः अवरोधी किस्में तथा गहरी जुताई आवश्यक है। खेत की स्वच्छता तथा उचित फसल चक्र भी अपनाने चाहिए। बीज का उपचार 0-025% सिरेसान से करना लाभदायक है।
हानिकारक कीट-पतंगे एवं उनकी रोकथाम-
(1) फिली बीटिल (Flee beetle)-
यह कर मकालीन फसल के अंकुरण के पश्चात् अपना प्रभाव दिखाता है। पत्तियों पर छेद होकर पौधा सूख जाता है। इसकी रोकथाम के लिए बुआई से पूर्व 101% कणिकाओं के रूप में 20 किया चिमेट प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए।
(2) किड-
यह कोट भण्डार गृह में लोबिया के दानों को हानि पहुंचाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए कीटनाशक दवाओं का घूमन (fumigation) तथा भण्डार गृह की सफाई आवश्यक है। इसके अतिरिक्त लगभग सभी फिगर हैयरी कैटरपिलर) आदि जो मूंग और पहुंचाते हैं, लोबिया के लिए भी हानिकारक है।
कटाई-
चारे व हरी खाद के लिए इसकी फसल 60-70 दिन में व दाने के लिए 90-110 दिन में पककर तैयार हो जाती है।
फलियों को सब्जियों के रूप में प्रयोग करने के लिये उस समय तोड़ते हैं जबकि उनके अन्दर दाने पूर्ण रूप से भर जाएँ तथा दाने हरे ही रहें। फलियाँ इस अवस्था में तोड़ने पर तना चारे के काम आ जाता है। दाने की फसल वर्षा ऋतु में 50% फलियाँ पकते ही फलियाँ तोड़ लेनी चाहिएँ ।

उपज -
बसन्तकालीन फसल से दाना 10-15 कु व वर्षाकालीन फसल से दाना 15-20 कु०/० तक प्राप्त हो जाता है। हरे चारे वाली जातियों से 200-250 कु० प्रति हे० तक हरा चारा प्राप्त हो जाता है।
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