अण्डी, अरण्डी या रेंड की वैज्ञानिक खेती- Arandi ki kheti,बेकार , बंजर पड़ी भूमि पर Arandi ki kheti करके लाखो कमाए, कम लगत ज्यादा कमाई, Arandi ki kheti से कैसे करे

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    Botanical classification




Botanical name-Ricinus communis L.


Family - Euphorbiaceae


Chromosome number- 2n = 20


महत्व एवं उपयोग(Important and Utility)-




भारत के विभिन्न भागों में Arandi ki kheti तिलहन की फसल के रूप में अरंडी के बीज के लिए की जाती है। इसके बीज को पेरकर तेल निकाला जाता है। तेल निकालने पर अरंडी की खली उपफल के रूप में उत्पन्न होती है। प्रतिवर्ष हमारे देश से अरंडी का तेल तथा बीजों का निर्यात विदेशों में किया जाता है। इसके तेल का प्रयोग मशीन में स्नेहक पदार्थ और गुड़ बनाने में किया जाता है।

अरंडी के तेल से सुगंधित तेल(Perfumed hair oil), पारदर्शी साबुन(Transparent soap),  विसंक्रामक पदार्थ तथा औषधी तैयार की जाती है।

चमड़े के उद्योग में अरंडी के तेल का प्रयोग चमड़ा मुलायम रखने के लिए किया जाता है। प्लास्टिक उद्योग में भी अरंडी के तेल का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग प्लास्टिक, छपाई की रेशनाई, मोम, रबर पदार्थ, पेंट व वार्निश के लिए भी किया जाता है।

अरंडी के पौधे की हरी पत्तियां का प्रयोग रेशम के कीड़े के भोजन के लिए भी किया जाता है। अरंडी के तेल से कृत्रिम  चमड़ा भी बनाया जाता है। लिनोलियम व टाइपराइटर की रोशनाई भी इससे बनती है। कपड़ा रंगाई के उद्योग में काम आने वाला योगिक जिसे 'टर्की लाल तेल' कहते हैं इससे बनाया जाता है।

अरण्डी की खेती


उत्पत्ति एवं इतिहास(Origin and History)-




अधिकांश वैज्ञानिकों के मतानुसार अरंडी का जन्म स्थान अफ्रीका या इथोपिया है।

कश्मीरकी घाटी, हिमालय के पहाड़ी क्षेत्र तथा असम के कुछ स्थानों पर अरंडी के पौधे जंगली अवस्था में उगे हुए पाए जाते हैं। जिनके आधार पर कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि अरंडी की उत्पत्ति स्थान भारत है।

संस्कृत भाषा में भी अरंडी का नाम एरण्ड या रुभूका मिलता है। आयुर्वेद में यहां उल्लेख भी मिलता है की औषधि निर्माण के लिए अरंडी का पौधा भारत में विदेश से मंगवाया गया।

अरण्डी की खेती


वितरण एवं क्षेत्रफल(Area and Distribution)-




विश्व में अरंडी की खेती ब्राज़ील, संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेंटीना, मिस्त्र, सूडान, दक्षिण तथा मध्य अफ्रीका के देश इटली, फ्रांस, अरब, फारस, ईरान, भारत, कोरिया, कंबोडिया व जापान इंडोनेशिया आदि देशों में होती है। उपज के अनुसार विश्व में प्रथम स्थान ब्राजील तथा द्वितीय स्थान भारत को प्राप्त है।

भारत के अधिकांश प्रांत में अरंडी की खेती की जाती है। आंध्र प्रदेश में भारत के कुल उत्पादन का लगभग 50% भाग उत्पन्न किया जाता है।


जलवायु(Climate)-




अरंडी समुद्र तल से लेकर 6000 से 7000 की ऊंचाई तक उगाई जा सकती है। इसकी बुवाई खरीफ ऋतु में तथा कटाई रवि में की जाती है। इसकी खेती को पाले से भारी नुकसान होता है।

पौधे की जड़े अधिक गहराई तक जाने के कारण सूखे को भी सहन कर लेती है। जहां वार्षिक वर्षा 65 से 85 सेंटीमीटर तक होती है। अरंडी की खेती सफलतापूर्वक की जाती है। पौधे की वृद्धि के समय तथा बीज पकने के समय उच्च तापक्रम तथा पौधे पर फूल आते समय अपेक्षाकृत कम तापमान की आवश्यकता होती है। विभिन्न अवस्था पर 65° F से 100° F तक तापमान अनुकूल होता है।

अरण्डी की खेती


भूमि एवं भूमि की तैयारी(Land and Land Management)-




भारत के विभिन्न भागों में अरंडी की खेती विभिन्न प्रकार की मृदा पर की जाती है। उत्तरी भारत में साधारणतया एल्यूवियल मृदा और दक्षिणी भारत में लैटराइटिंक मृदा अरंडी की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

खेत की तैयारी के लिए प्रथम जूताई मिट्टी पलट हल या हैरों से करते हैं। हैरों की 2 - 3 जुताई करने के बाद टीलर की सहायता से दो जुताई करते हैं। उसके उपरांत एक जुताई रूटर की सहायता से करके खेत को पाटे से समतल कर लिया जाता है।


उन्नतशील जातियां(Improved varieties)-



जातियां


अवधि दिनों में 


उपज कु०/हे०


तेल %


अन्य 

1. उत्तर प्रदेश

टा० 3


260-290


10-14


56


लम्बी सघन बाली (Compact spikes), बीज भूरे रंग के नैनीताल की स्थानीय जाति से चयन द्वारा निकाली गई है, दाने नहीं छिटकते, 


बीज मध्यम सुडौल


बीज मध्यम आकार तना लाल, लम्बी ठोस व विकौनी स्पाइक दाने छिटकते नहीं

तराई 4


240-290


12-14


52

कालपी 6


-


14


51

पंजाब अंडी 1 (pc 1 )


210-230


10-15


54

2. आन्ध्र प्रदेश

दो फसली खेती के उपयुक्त पंजाब, हरियाणा म० प्र०, राजस्थान, बिहार के शुष्क क्षेत्रों के लिए भी उपयुक्त

दानों का आकार मध्यम व रंग गहरा भूरा

अरुणा


145-175


20-23


52

भाग्य


120-150


2025


53

सौभाग्य


180-210


20-25


50

3. हरियाणा

दाने मध्यम आकार के बहुत बौनी अगेती, स्पाइक एक साथ पकती है, छोटी गांठे, गुलाबी-लाल तना पंजाब के भी उपयुक्त है।पौधे छोटे दाने का रंग लाल-भूरा, यह संकर किस्म अधिकतर क्षेत्रों के लिए मुख्यतया गुजरात के लिए उपयुक्त है तना लाल रंग का दाने गहरे भूरे रंग के

सी० एच० 1


120-130


15-20


49

पंजाब अडी 1


210-150


10-15


54

जी०सी०एच० 3


140-150


15-20


48

एच०सी० 6


225


12-15


48

गत वर्ष में अरंडी की नई विकसित उन्नत जातियां-


1997 - DCS -9 ,CGH -5, DCH -32

1999 - GCH -6, TMVCH- 1 क्रान्ति

2000 -DCH-177 (दीपक)


अरंडी की शंकर जातियां-


GAU-3, CH -1, GCH-2,  GCH -4 है।

2006- DCH 519 - यहां अरंडी की संकर प्रजाति है। जिसके उपज क्षमता 17 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा बीजों में तेल की मात्रा 49% तक होती है यहां प्रजाती Fusarium wilt के प्रति सहिष्णु है।

2007- RG  2819-  यहां प्रजाती मैक्रोफोमिना, जड़ विगलन एवं उकठा के प्रति सहिष्णु है।

अरण्डी की खेती


बीज एवं बीज की मात्रा(Seed and Seed Rate)-




बीज सदैव जाति के अनुसार प्रमाणित एवं कवकनाशी राशन से उपचारित करना चाहिए।

विभिन्न परिस्थितियों में अरंडी के बीज की प्रयोग की जाने वाली मात्रा-


बुवाई के विधि           शुद्ध फसल         मिश्रित फसल


1)डिबलिंग विधि।      8-10 किग्रा० हे०   3-5 किग्रा० हे०

2) हल्के पीछे कुंडों में  12-15किग्रा०हे०   5-8किग्रा० हे०


बोने की विधि (Sowing Mathod)-




अलग-अलग क्षेत्र में बुवाई की अलग-अलग विधि प्रचलित है। हल  के पीछे पंक्तियों में बुवाई मिश्रित अथवा अकेली फसल के लिए उचित अंतरण पर एक आदमी कुंड बनाता है । और दूसरा आदमी उचित दूरी पर बीज कुंड में डालता है।

डिब्रिंग विधि से खेत में रस्सी की सहायता से उचित अंतरण पर निशान लगाकर पंक्तियों की दूरी निश्चित कर लेते हैं । खुरपी की सहायता से पौधे से पौधे का अंतरण ध्यान में रखते हुए दो बीज एक साथ दब देते हैं।


अंतरण(Spacing)-




शुद्ध अथवा अकेली फसल में पंक्तियों के बीच 90 सेंटीमीटर व पौधे के बीच 7 सेंटीमीटर का अंतरण रखते हैं। बोनी किस्मों में अंतरण 60 × 45 सेंटीमीटर रखते हैं।


खाद एवं उर्वरक(Manure and Fertilizer)-




अरंडी की फसल के लिए 100 से 150 कुंतल गोबर की खाद व 8 से 10 कुंटल नीम की खली की खाद प्रति हेक्टेयर देना लाभदायक रहता है।

अरंडी की फसल से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए नाइट्रोजन फास्फोरस व पोटाश की आवश्यकता होती है। जो निम्न प्रकार है-

पोषक तत्त्व (किग्रा / हे०)


क्षेत्रीय जातियाँ


संकर जातियाँ

नत्रजन (N)


40-50


80

फॉस्फोरस (P2O5)


40-50


60

पोटाश (K2O)


20-40


60

सिंचाई( Irrigation)-




बुवाई के समय प्राप्त नमी का मृदा में होना आवश्यक है। वर्षा ऋतु में सूखा पड़ने पर एक से दो सिंचाई की आवश्यकता पडती है। 20 से 25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए तथा दाना बनते समय सिंचाई का विशेष ध्यान रखा जाता है।


निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण(Weed Control)-




अरंडी की शुद्ध फसल से दो से तीन निराई गुड़ाई करना लाभदायक रहता है। मिश्रित फसल में मुख्य फसल के अनुसार निकाय गुड़ाई करते हैं।


पादप सुरक्षा-




हानिकारक कीट एवं उनकी रोकथाम(Dangerous Insect and controls)-


बिहार की रोएंदार सूंडी या गिंडार-


यहां के लगभग सारे भारतवर्ष में फैला हुआ है। इसका प्रकोप सोयाबीन तेल अरंडी लोबिया शकरकंद और मूंगफली आदि फसलों पर होता है। अरंडी पर इसका प्रकोप अगस्त से नवंबर तक होता है।

इसकी रोकथाम के लिए 0.04% पैराथियान या  नुवान 800 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़कना चाहिए।


अरंडी की सेमिलूपर(Achaea janata)-


यहां सुंडी पत्तियों की निचली सतह को खाती है। यह अधिकतर जुलाई से नवंबर तक अधिक क्रियाशील होती है। वर्ष भर में इसकी दो से तीन पीढ़ियां हो जाती है।

इसकी रोकथाम के लिए 0.15% थायोडान या पैराथियोन या 0.3% डाईमाइक्रोन 900 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव अधिक प्रभावशाली रहता है।


अरंडी बीज छेदक(Heliothus armigera)-


इसके सुंडी 2 सेंटीमीटर के लगभग गुलाबी रंग की होती है। इसकी सुंडी अरंडी के फलों में छेद कर के अंदर घुस जाती है और दानों को खाती है।

इसकी रोकथाम के लिए थायोडान का छिड़काव 15 से मिलीलीटर की दर से 900 लीटर पानी में घोलकर एक हेक्टेयर में छिड़काव करना चाहिए। इसके दो छिड़काव 15 दिन के अंदर पर करनी चाहिए।


रोग एवं उनके रोकथाम(Disease and controls)-


लीफ ब्लाइट या अंगमारी(Leaf blight Alternaria ricini)-


यहां बीमारी फफूंद से लगती है। यहां बीमारी बीज अंकुर के 15 से 20 सेंटीमीटर होने के बाद लगती है। और बीजांकुरो को नष्ट कर देती है। पत्तियों पर दोनों तरफ गोल भूरी हरे रंग के धब्बे बन जाते हैं । कभी कभी तना भी गलने लगता है।

इसके रोकथाम के लिए 2 : 2 : 50 का बोर्डो मिश्रण का छिड़काव दो से तीन बार 15 दिन के अंतर से करना चाहिए। या जिनेब का 10 से 15 दिन के अंतर पर 0.2% का छिड़काव तीन बार करना चाहिए।


रतुआ या गेरुआ(Rust)-


इस रोग में पत्तियों के दोनों सतह पर भुरे धब्बे पढ़ते हैं। पत्ति की निचली सतह पर धब्बे अधिक होते हैं । अधिक प्रकोप में पत्तिया सूखती है।

इसकी रोकथाम के लिए 0. 2% डायथेन Z -78 अथवा डायथेन M-45 का घोल का छिड़काव करना चाहिए।


फसल की कटाई एवं मंडांई(Crop Harvesting and Threshing)-




सामान्यता: 4 से 5 महीने में पौधे पर फूल आने प्रारम्भ हो जाते हैं। फूल आने के बाद फल दो-तीन माह के बाद पकते हैं। विभिन्न जातियों की बुवाई के अनुसार फसल नवंबर से लेकर फरवरी तक पक कर तैयार होती है।

अरंडी के पौधे पर बहुत सारे फूल एक साथ गुच्छे के रूप में आते हैं । गुच्छो की लंबाई 30 से 80 सेंटीमीटर तक जाती के अनुसार पाई जाती है। एक गुच्छे में 50 से 200 तक फल पाए जाते हैं। एक फल में प्रायः 3 तक बीज पाए जाते हैं।

गुच्छो को खेत में उचित समय पर तोड़ना आवश्यक है। क्योंकि फल अधिक सूखने पर चटक जाते हैं। व बाहर खेत में बिखर जाते हैं। पौधे को से तोड़कर गुच्छे को धूप में सुखाकर डंडे की सहायता से फलों से बीज को अलग कर लिया जाता है।


उपज(Yield)-




अरंडी की फसल से मिश्रित रूप में उगाई जाने पर 5-6 कुंटल व अकेली फसल उगाने पर 10 से 12 कुंटल प्रति हेक्टेयर तक दाने की उपज प्राप्त हो जाती है। दाने के अंदर विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार 40 से 50% तक तेल पाया जाता है।

 


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अरंडी की खेती कौन से महीने में होती है?


अरण्डी  ज्यादातर खरीफ फसल के रूप में उगाया जाता है, यह आमतौर पर जून-जुलाई के महीने में बोया जाता है। फसल बोने के लिए कतारों के बीच की दूरी 90 सेमी. मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 45 सेमी.


अरंडी 1 एकड़ में कितनी होती है?


इसकी औसत उपज 17.86 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। बारानी इलाकों में अरंडी की पैदावार 15-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक, सिंचित क्षेत्रों में 30-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है।


अरंडी की खेती कब और कैसे करें?


अरंडी  की बुआई कब और कैसे करें, इसकी बुआई ज्यादातर जुलाई और अगस्त में करनी चाहिए। अरंडी की खास बात यह है कि सभी खरीफ फसलों की खेती पूरी हो जाने के बाद, मानसून के आगमन के साथ, अरंडी को आसानी से उगाया जा सकता है।


अरंडी के बीज की कीमत क्या है?


अरंडी की वर्तमान कीमत बदलती रहती है। भारत में अरंडी की कीमत वर्तमान में 4,360 रुपये प्रति 100 किलोग्राम है।


1 एकड़ में कितने पौधे रोपे जाते हैं?


अगर आप नर्सरी से पौधा खरीदना चाहते हैं तो आपको एक एकड़ जमीन के लिए लगभग 8000 पौधों की जरूरत पड़ेगी, नर्सरी में एक पौधे की कीमत 1.5 रुपये से लेकर 2 रुपये तक होती है। यानी इसकी कीमत 12,000 से 16,000.03-जून-2022 तक है


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